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उत्पत्ति 8
जल-प्रलय के बाद

आठवाँ अध्याय जल-प्रलय के अन्त का वर्णन करता है: परमेश्वर नूह को स्मरण करता है, जल घटता है और जहाज अरारात के पहाड़ पर टिक जाता है। नूह एक कौवा और फिर एक कबूतरी भेजता है, जो जैतून का पत्ता लेकर लौटती है। अन्त में पूरा परिवार जहाज से निकलता है; नूह एक वेदी बनाता है और परमेश्वर वचन देता है कि ऋतुओं का क्रम कभी नहीं रुकेगा।

पाठ: इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी, © 2019 Bridge Connectivity Solutions, CC BY-SA 4.0। शीर्षक, परिचय और चित्र: Imago Biblia।

पद 1–5

परमेश्वर ने नूह को स्मरण किया

परमेश्वर ने नूह और जितने जंगली पशु और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभी की सुधि ली: और परमेश्वर ने पृथ्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा।

गहरे समुद्र के सोते और आकाश के झरोखे बंद हो गए; और उससे जो वर्षा होती थी वह भी थम गई।

और एक सौ पचास दिन के पश्चात् जल पृथ्वी पर से लगातार घटने लगा।

सातवें महीने के सत्रहवें दिन को, जहाज अरारात नामक पहाड़ पर टिक गया।

और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहले दिन को, पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई दीं।

बादल छँटते हैं और सूर्य लौटता है: जहाज अरारात के पहाड़ की चट्टानी चोटी पर टिका है, और दूसरी चोटियाँ जल से बाहर आती हैं।

पद 6–9

कौवा और कबूतरी

फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात् नूह ने अपने बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोलकर,

एक कौआ उड़ा दिया: जब तक जल पृथ्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर-उधर फिरता रहा।

फिर उसने अपने पास से एक कबूतरी को भी उड़ा दिया कि देखे कि जल भूमि से घट गया कि नहीं।

उस कबूतरी को अपने पैर टेकने के लिये कोई आधार न मिला, तो वह उसके पास जहाज में लौट आई: क्योंकि सारी पृथ्वी के ऊपर जल ही जल छाया था तब उसने हाथ बढ़ाकर उसे अपने पास जहाज में ले लिया।

जहाज की खिड़की से झुककर नूह एक थकी हुई सफ़ेद कबूतरी को हाथ में लेता है, जबकि एक कौवा जल के ऊपर उड़ जाता है।

पद 10–12

जैतून का पत्ता

तब और सात दिन तक ठहरकर, उसने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया।

और कबूतरी साँझ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जैतून का एक नया पत्ता है; इससे नूह ने जान लिया, कि जल पृथ्वी पर घट गया है।

फिर उसने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौटकर न आई।

सूर्यास्त के समय कबूतरी चोंच में जैतून का पत्ता लिए जहाज की ओर लौटती है; नूह और उसका परिवार आनन्द से उसका स्वागत करते हैं, और हरी पहाड़ियाँ फिर दिखती हैं।

पद 13–19

“जहाज में से निकल आ”

नूह की आयु के छः सौ एक वर्ष के पहले महीने के पहले दिन जल पृथ्वी पर से सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोलकर क्या देखा कि धरती सूख गई है।

और दूसरे महीने के सताईसवें दिन को पृथ्वी पूरी रीति से सूख गई।

तब परमेश्वर ने नूह से कहा,

“तू अपने पुत्रों, पत्नी और बहुओं समेत जहाज में से निकल आ।

क्या पक्षी, क्या पशु, क्या सब भाँति के रेंगनेवाले जन्तु जो पृथ्वी पर रेंगते हैं; जितने शरीरधारी जीव-जन्तु तेरे संग हैं, उन सब को अपने साथ निकाल ले आ कि पृथ्वी पर उनसे बहुत बच्चे उत्पन्न हों; और वे फूलें-फलें, और पृथ्वी पर फैल जाएँ।”

तब नूह और उसके पुत्र और पत्नी और बहुएँ, निकल आईं। (2 पत. 2:5)

और सब चौपाए, रेंगनेवाले जन्तु, और पक्षी, और जितने जीवजन्तु पृथ्वी पर चलते फिरते हैं, सब जाति-जाति करके जहाज में से निकल आए।

वसन्त की एक सुबह नूह का परिवार जहाज से उतरकर फूलों भरी घास पर आता है, पशु घाटी में फैलते हैं और पक्षी उड़ जाते हैं।

पद 20–22

वेदी और वचन

तब नूह ने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं, और सब शुद्ध पक्षियों में से, कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया।

इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, “मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को श्राप न दूँगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्पन्न होता है वह बुरा ही होता है; तो भी जैसा मैंने सब जीवों को अब मारा है, वैसा उनको फिर कभी न मारूँगा।

अब से जब तक पृथ्वी बनी रहेगी, तब तक बोने और काटने के समय, ठंडा और तपन, धूपकाल और शीतकाल, दिन और रात, निरन्तर होते चले जाएँगे।”

नूह पत्थरों की वेदी के सामने घुटने टेककर प्रार्थना करता है, जिससे धुआँ उठता है, उसका परिवार साथ है; दूर लोग सूर्य और चन्द्रमा के नीचे बोते और काटते हैं।