बाइबिल चित्रों में

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उत्पत्ति 1
सृष्टि

बाइबिल का पहला अध्याय छह दिनों में संसार की सृष्टि का वर्णन करता है, और हर दिन एक ही वाक्य से चिह्नित है: “परमेश्वर ने कहा… और वैसा ही हो गया… फिर साँझ हुई फिर भोर हुआ।” यह पाठ एक कविता की तरह आगे बढ़ता है: पहले अव्यवस्था में व्यवस्था लाता है, फिर उसे जीवन से भर देता है।

पाठ: इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी, CC BY-SA 4.0। शीर्षक, परिचय और चित्र: Imago Biblia।

दो स्तम्भों में छह चित्र। बाईं ओर दिन 1 से 3: समुद्र के ऊपर उजियाला, जल के ऊपर गुम्बद जैसा आकाश, पेड़ों से ढकी भूमि। दाईं ओर दिन 4 से 6, जो उन्हें भरते हैं: सूर्य, चन्द्रमा और तारे; पक्षी और मछलियाँ; पशु, पुरुष और स्त्री। दिन 1 · उजियाला दिन 2 · आकाश और जल दिन 3 · भूमि और पौधे दिन 4 · ज्योतियाँ दिन 5 · पक्षी और मछलियाँ दिन 6 · पशु और मनुष्य
  • दिन 1 से 3: स्थान बनाना
  • दिन 4 से 6: उन्हें भरना

पद 1 और 2

उजियाले से पहले

आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। (इब्रा. 1:10, इब्रा. 11:3)

पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अंधियारा था; तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डराता था। (2 कुरि. 4:6)

काले आकाश के नीचे एक अँधेरा, बिना किनारे का महासागर, जिसकी सतह हवा से हिल रही है।

पहला दिन · पद 3–5

उजियाला हो

तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो,” तो उजियाला हो गया।

और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अंधियारे से अलग किया।

और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अंधियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

अँधेरे महासागर के ऊपर एक विशाल उजियाला चमकता है और अंधकार को किनारों की ओर धकेलता है।

दूसरा दिन · पद 6–8

जल के बीच अन्तर

फिर परमेश्वर ने कहा, “जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।”

तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग-अलग किया; और वैसा ही हो गया।

और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।

संसार, जैसा प्राचीन पाठक उसकी कल्पना करते थे: सबसे ऊपर जल का भण्डार, उसके नीचे पारदर्शी गुम्बद, और समुद्रों के बीच भूमि। अन्तर के ऊपर का जल अन्तर: आकाश (पद 8) भूमि नीचे का जल: समुद्र

तीसरा दिन · पद 9–13

भूमि और पौधे

फिर परमेश्वर ने कहा, “आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे,” और वैसा ही हो गया। (2 पत. 3:5)

और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे-छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक-एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें,” और वैसा ही हो गया। (1 कुरि. 15:38)

इस प्रकार पृथ्वी से हरी घास, और छोटे-छोटे पेड़ जिनमें अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक-एक की जाति के अनुसार उन्हीं में होते हैं उगें; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।

समुद्र से उभरती पहाड़ियाँ, जो घास, जंगली अनाज, अंजीर, जैतून और खजूर से ढक जाती हैं।

चौथा दिन · पद 14–19

आकाश की ज्योतियाँ

फिर परमेश्वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों;

और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें,” और वैसा ही हो गया।

तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाईं; उनमें से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया; और तारागण को भी बनाया।

परमेश्वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिए रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें,

तथा दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अंधियारे से अलग करें; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया।

तीन गोल चित्र: आधा दिन आधा रात वाला आकाश, सूर्य और चन्द्रमा के साथ; झुण्ड के ऊपर तारों भरा आकाश और चन्द्रमा की कलाएँ; खेत पर सूर्य की किरणें।
  • अलग करना दिन को रात से · पद 14
  • चिह्न ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए · पद 14
  • प्रकाश देना पृथ्वी पर · पद 15

पाँचवाँ दिन · पद 20–23

मछलियाँ और पक्षी

फिर परमेश्वर ने कहा, “जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।”

इसलिए परमेश्वर ने जाति-जाति के बड़े-बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिनसे जल बहुत ही भर गया और एक-एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्टि की; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

परमेश्वर ने यह कहकर उनको आशीष दी, “फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें।”

तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पाँचवाँ दिन हो गया।

समुद्र और आकाश में बँटा दृश्य: पानी के नीचे मछलियों के झुण्ड और एक व्हेल, ऊपर अनेक प्रकार के पक्षियों के झुण्ड।

छठा दिन · पद 24–31

पशु और मनुष्य

फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से एक-एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वन पशु, जाति-जाति के अनुसार उत्पन्न हों,” और वैसा ही हो गया।

इस प्रकार परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति-जाति के वन-पशुओं को, और जाति-जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति-जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

फिर परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” (याकू. 3:9)

तब परमेश्वर ने अपने स्वरूप में मनुष्य को रचा, अपने ही स्वरूप में परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की; नर और नारी के रूप में उसने मनुष्यों की सृष्टि की। (मत्ती 19:4, मर. 10:6, प्रेरि. 17:29, 1 कुरि. 11:7, कुलु. 3:10, 1 तीमु. 2:13)

और परमेश्वर ने उनको आशीष दी; और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।”

फिर परमेश्वर ने उनसे कहा, “सुनो, जितने बीजवाले छोटे-छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैंने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं; (रोम. 14:2)

और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले जन्तु हैं, जिनमें जीवन का प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैंने सब हरे-हरे छोटे पेड़ दिए हैं,” और वैसा ही हो गया।

तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया। (1 तीमु. 4:4)

भोर के समय पहाड़ी की चोटी पर पीछे से दिखते एक पुरुष और एक स्त्री, जो झुण्डों और जंगली पशुओं से भरे उपजाऊ मैदान को देख रहे हैं।